उत्तराखण्ड में नई शिक्षा क्रांति या नया विवाद

उत्तराखण्ड में नई शिक्षा क्रांति या नया विवाद

मौहम्मद शाह नज़र

देहरादून। उत्तराखंड की धामी सरकार ने मदरसा शिक्षा व्यवस्था को हटाकर नई व्यवस्था लागू करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने मंगलवार को विधानसभा में उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा विधेयक, 2025 पेश किया। इस दौरान विपक्षी कांग्रेस ने जोरदार हंगामा करते हुए इसे वोट बैंक की राजनीति करार दिया, जबकि सत्तारूढ़ भाजपा ने कहा कि यह कदम सभी अल्पसंख्यक समुदायों के हित में है और शिक्षा नीति को समान आधार पर लागू करने की दिशा में उठाया गया है।

मुख्यमंत्री धामी ने कहा कि देश में पहली बार किसी राज्य में ऐसा अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण बनाया जा रहा है, जो केवल मुस्लिम मदरसों तक सीमित नहीं होगा बल्कि सिख, पारसी, बौद्ध, ईसाई और जैन समुदाय के शैक्षणिक संस्थानों को भी शामिल करेगा। शैक्षणिक सत्र 2026-27 से मदरसा शिक्षा बोर्ड समाप्त कर दिया जाएगा और सभी अल्पसंख्यक शिक्षा संस्थान उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण से मान्यता प्राप्त करेंगे।

विधेयक के अनुसार, प्राधिकरण में एक अध्यक्ष और ग्यारह सदस्य होंगे जिन्हें राज्य सरकार नामित करेगी। अध्यक्ष अल्पसंख्यक समुदाय का अनुभवी शिक्षाविद होगा। सभी अल्पसंख्यक संस्थानों को मान्यता के लिए यह सुनिश्चित करना होगा कि वे संबंधित समुदाय की और से संचालित हों, पंजीकृत निकाय द्वारा प्रबंधित हों और उनमें गैर-अल्पसंख्यक छात्रों की संख्या 15 प्रतिशत से अधिक न हो। साथ ही प्राधिकरण अल्पसंख्यक धर्मों और भाषाओं से संबंधित विषयों का पाठ्यक्रम तैयार करेगा तथा परीक्षाओं और प्रमाण-पत्र जारी करने की व्यवस्था भी करेगा।

गौरतलब है कि राज्य में 452 पंजीकृत मदरसे हैं, जबकि 500 से अधिक मदरसे गैर पंजिकृत है, जिनमें से 237 को सरकार ने पिछले छह माह में बंद किया था, जिसके खिलाफ मदरसा प्रबंधक हाईकोर्ट गये, जहा से उनहे शर्तो के साथ राहत मिल रही है। वहीं, हाल ही में अल्पसंख्यक कल्याण विभाग ने मदरसों में केंद्रीय छात्रवृत्ति और मिड डे मील योजनाओं में बड़े पैमाने पर गड़बड़ियां पकड़ी थीं। इन्हीं कारणों को आधार बनाते हुए धामी सरकार ने मदरसा शिक्षा को मुख्यधारा से जोड़ने का निर्णय लिया है।

इस विधेयक पर बुधवार को विधानसभा में बहस होने की संभावना है। सत्ता पक्ष इसे शिक्षा में पारदर्शिता और गुणवत्ता लाने की दिशा में ऐतिहासिक कदम बता रहा है, वहीं विपक्ष इसे अल्पसंख्यक समुदायों को लेकर राजनीतिक लाभ उठाने की कवायद करार दे रहा है। आइए जानते हैं इस विधेयक के मुख्य बिंदु, इसके लाभ और संभावित चुनौतियां।

विधेयक के अनुसार, ऐसा शैक्षणिक संस्थान जो किसी अल्पसंख्यक समुदाय (इसाई, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी या मुस्लिम) द्वारा स्थापित और संचालित हो और जिसे प्राधिकरण से मान्यता प्राप्त हो, उसे ‘अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान’ माना जाएगा।

मान्यता प्राप्त अल्पसंख्यक संस्थानों को अपने धर्म से संबंधित विशिष्ट विषय पढ़ाने की अनुमति होगी। हालांकि, यह विषय प्राधिकरण द्वारा तय मानकों और गुणवत्ता के अनुरूप होंगे। संस्थान स्वयं परीक्षा आयोजित करेंगे और प्रमाण-पत्र जारी करेंगे। यह प्रमाण-पत्र विद्यालयी शिक्षा परिषद द्वारा दिए गए प्रमाण-पत्र से अतिरिक्त होगा।

वर्तमान में उत्तराखण्ड मदरसा शिक्षा बोर्ड से मान्यता प्राप्त मदरसे शैक्षिक सत्र 2025-26 तक अपनी व्यवस्था जारी रख सकेंगे। लेकिन 2026-27 से धार्मिक शिक्षा जारी रखने के लिए उन्हें नए प्राधिकरण से मान्यता लेनी होगी। 01 जुलाई 2026 से मदरसा शिक्षा बोर्ड अधिनियम 2016 और अरबी-फारसी मान्यता विनियमावली 2019 निरस्त मानी जाएगी।

राज्य सरकार एक नया निकाय बनाएगी जिसका नाम होगा ‘उत्तराखण्ड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण’। इसमें एक अध्यक्ष और 11 सदस्य होंगे। अध्यक्ष अल्पसंख्यक समुदाय का ऐसा शिक्षाविद होगा जिसके पास कम से कम 15 वर्ष का शिक्षण अनुभव और 5 वर्ष प्रोफेसर के रूप में अनुभव होगा। 11 सदस्यों में 6 अल्पसंख्यक समुदाय से और 5 सरकारी/शैक्षिक क्षेत्र से होंगे।

  • अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों को मान्यता देना।
  • अल्पसंख्यक धर्म और भाषाओं से जुड़े विषयों का पाठ्यक्रम तैयार करना।
  • संस्थानों में पढ़ाए जाने वाले धार्मिक विषयों की परीक्षा और मूल्यांकन की निगरानी करना।
  • शिक्षा की गुणवत्ता और छात्रों के हितों की रक्षा करना।
  • संस्थानों की शिकायतों पर कार्रवाई करना।
  • संस्थान को मान्यता प्राप्त करने के लिए आवेदन करना होगा। मान्यता तभी मिलेगी जब संस्थान
  • अल्पसंख्यक समुदाय द्वारा स्थापित और संचालित हो।
  • पंजीकृत सोसाइटी, न्यास या गैर-लाभकारी कंपनी के अंतर्गत चलता हो।
  • जमीन का स्वामित्व संस्थान के नाम पर हो।
  • वित्तीय लेन-देन बैंक खाते से पारदर्शी तरीके से हो।
  • शिक्षकों की नियुक्ति निर्धारित मानकों के अनुसार हो।
  • गैर-अल्पसंख्यक छात्रों की संख्या 15 % से अधिक न हो।

यदि कोई संस्थान नियमों का उल्लंघन करता है, धन का दुरुपयोग करता है या धार्मिक-सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने वाला कार्य करता है, तो प्राधिकरण सुनवाई के बाद उसकी मान्यता समाप्त कर सकता है।

  • अल्पसंख्यक समुदायों की धार्मिक और भाषाई शिक्षा को वैधानिक मान्यता।
  • शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार और पारदर्शिता।
  • छात्रों को अतिरिक्त प्रमाण-पत्र मिलने से अवसरों का विस्तार।
  • धार्मिक शिक्षा और आधुनिक शिक्षा में संतुलन।
  • संस्थानों पर बढ़ी हुई प्रशासनिक जटिलता।
  • छोटे संस्थानों के लिए मान्यता की शर्तें पूरी करना कठिन हो सकता है।
  • सरकार के अधिक हस्तक्षेप से संस्थानों की स्वतंत्रता प्रभावित होने की आशंका।
  • 15 फीसदी गैर-अल्पसंख्यक छात्रों की सीमा विवाद का कारण बन सकती है।