क्या युवा, रोजगार और पेपर लीक बन सकता है चुनावी मुद्दा

क्या युवा, रोजगार और पेपर लीक बन सकता है चुनावी मुद्दा

मौहम्मद शाह नज़र

देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में लंबे समय बाद ऐसा देखने को मिला कि किसी बड़े राष्ट्रीय नेता ने अपनी पूरी सभा का केंद्र धर्म, जाति, राष्ट्रवाद या स्थानीय राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप को नहीं, बल्कि युवाओं, रोजगार और पेपर लीक को बनाया। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का देहरादून दौरा इसी कारण राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

छात्रों की गूंज कार्यक्रम में राहुल गांधी ने जिस तरह मंच पर छात्रों को बुलाकर उनकी बातें सुनीं और नीट अभ्यर्थी रिया कुमारी के पिता को मंच देकर उनकी पीड़ा पूरे प्रदेश के सामने रखी, उससे कांग्रेस ने यह संदेश देने की कोशिश की कि वह युवाओं के मुद्दे को राजनीतिक बहस के केंद्र में लाना चाहती है। वहीं, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कार्यक्रम केवल भीड़ जुटाने का नहीं, बल्कि उत्तराखंड की चुनावी राजनीति का एजेंडा बदलने का प्रयास था।

उत्तराखंड में पिछले एक दशक से भाजपा लगातार मजबूत स्थिति में रही है। 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने सत्ता में वापसी कर इतिहास बनाया। इसके बाद हुए लोकसभा चुनाव में भी भाजपा को व्यापक समर्थन मिला। ऐसे में कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती कोई ऐसा मुद्दा खड़ा करना था, जो सीधे आम मतदाता, विशेषकर युवाओं से जुड़ सके। पेपर लीक, भर्ती परीक्षाओं में अनियमितता, सरकारी नौकरियों में देरी और बढ़ता पलायन ऐसे मुद्दे हैं, जिनका असर हजारों नहीं बल्कि लाखों परिवारों तक पहुंचता है। राहुल गांधी ने इन्हीं मुद्दों को केंद्र में रखकर भाजपा सरकार को घेरने की कोशिश की।

उत्तराखंड में बीते कुछ वर्षों के दौरान कई भर्ती परीक्षाएं विवादों में रहीं। कई परीक्षाएं रद्द हुईं, दोबारा आयोजित करनी पड़ीं और लंबी जांच चली। इससे प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवाओं में असंतोष बढ़ा।

इसके साथ ही प्रदेश से लगातार पलायन, सीमित औद्योगिक निवेश और सरकारी नौकरियों की कम होती संख्या भी युवाओं के लिए चिंता का विषय रही है। राहुल गांधी ने अपने भाषण में इन्हीं मुद्दों को जोड़ते हुए यह संदेश देने का प्रयास किया कि कांग्रेस युवाओं की आवाज बनने के लिए तैयार है।

राजनीतिक दृष्टि से देखें तो उत्तराखंड में युवाओं की भूमिका लगातार बढ़ रही है। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले लाखों छात्र केवल शहरों में ही नहीं, बल्कि गांवों तक फैले हुए हैं। इनके परिवार भी भर्ती प्रक्रिया से सीधे जुड़े होते हैं।

यदि कांग्रेस पेपर लीक, रोजगार और शिक्षा को लेकर लगातार आंदोलन करती है, छात्र संगठनों को सक्रिय करती है और जिला स्तर तक संवाद अभियान चलाती है, तो युवाओं के एक वर्ग में उसके प्रति सकारात्मक माहौल बन सकता है।

हालांकि, यह मान लेना कि पूरा युवा वर्ग कांग्रेस के साथ खड़ा हो जाएगा, अभी जल्दबाजी होगी। उत्तराखंड का मतदाता परंपरागत रूप से राष्ट्रीय नेतृत्व, स्थानीय उम्मीदवार और संगठनात्मक मजबूती को भी महत्व देता है।

अब तक उत्तराखंड की राजनीति में चारधाम, समान नागरिक संहिता (यूसीसी), धार्मिक पर्यटन, सड़क, स्वास्थ्य और विकास जैसे मुद्दे प्रमुख रहे हैं। राहुल गांधी ने कोशिश की है कि आने वाले समय में श्रोजगार बनाम बेरोजगारीश्, श्मेहनत बनाम पेपर लीकश् और श्युवा बनाम व्यवस्थाश् की बहस भी उतनी ही प्रमुख हो। यदि कांग्रेस इस मुद्दे को लगातार जिंदा रखती है तो विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक विमर्श का स्वरूप बदल सकता है।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भाजपा इस मुद्दे को हल्के में नहीं लेगी। पार्टी पहले ही भर्ती प्रक्रियाओं में सुधार, नकल विरोधी कानून और दोषियों पर कार्रवाई जैसे कदमों का उल्लेख करती रही है। ऐसे में आने वाले समय में भाजपा इन उपलब्धियों को और अधिक आक्रामक तरीके से जनता के सामने रख सकती है। यानी आने वाले महीनों में रोजगार और भर्ती प्रक्रिया भी उत्तराखंड की राजनीति के प्रमुख मुद्दों में शामिल हो सकती है।

राहुल गांधी का कार्यक्रम सफल माना जा सकता है, लेकिन किसी भी राजनीतिक अभियान की असली परीक्षा कार्यक्रम समाप्त होने के बाद शुरू होती है। यदि कांग्रेस अब भी केवल प्रेस कॉन्फ्रेंस और विरोध प्रदर्शन तक सीमित रहती है तो इस कार्यक्रम का असर धीरे-धीरे कम हो सकता है। लेकिन यदि पार्टी, प्रत्येक जिले में छात्र संवाद आयोजित करती है। पेपर लीक पीड़ितों के साथ अभियान चलाती है। रोजगार पर ठोस नीति दस्तावेज जारी करती है। युवाओं के बीच डिजिटल और जमीनी दोनों स्तर पर सक्रिय रहती है। तो यह अभियान कांग्रेस के लिए राजनीतिक लाभ का आधार बन सकता है।

इस सवाल का सीधा उत्तर अभी संभव नहीं है। चुनाव केवल एक मुद्दे पर नहीं जीते या हारे जाते। उत्तराखंड में उम्मीदवार, संगठन, स्थानीय नेतृत्व, सरकार का प्रदर्शन, सामाजिक समीकरण और मतदान के समय का माहौल भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है। फिर भी यह कहा जा सकता है कि यदि युवाओं का एक हिस्सा रोजगार और पेपर लीक को मतदान का प्रमुख आधार बनाता है और कांग्रेस इस मुद्दे पर निरंतर सक्रिय रहती है, तो कई विधानसभा सीटों पर मुकाबला पहले से अधिक रोचक हो सकता है।

राहुल गांधी का देहरादून दौरा भीड़ जुटाने से अधिक राजनीतिक संदेश देने का प्रयास था। कांग्रेस ने पहली बार उत्तराखंड में युवाओं की नाराजगी को संगठित राजनीतिक मुद्दे का रूप देने की कोशिश की है। इस अभियान की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि पार्टी इसे एक कार्यक्रम तक सीमित रखती है या पूरे प्रदेश में आंदोलन का रूप देती है। फिलहाल इतना तय है कि उत्तराखंड की राजनीति में अब पेपर लीक और रोजगार का मुद्दा पहले से कहीं अधिक मजबूती से चर्चा में आ चुका है। आने वाले महीनों में यही मुद्दा कांग्रेस की ताकत बनेगा या भाजपा इसे अपने पक्ष में मोड़ लेगी, इस पर प्रदेश की सियासत की अगली दिशा काफी हद तक निर्भर करेगी।