- काबुल की निर्वासित सरकार में हिंदू राजा महेंद्र प्रताप को बनाया गया था राष्ट्रपति
- मुसलमान आतंकवादी नहीं हैं, नफरत फैलाने वाले सांप्रदायिक लोग ही आतंकवादी
- कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी,
- सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-जमाना हमारा
नई दिल्ली। दारुल उलूम देवबंद में आयोजित स्वतंत्रता दिवस समारोह को संबोधित करते हुए जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने देश की आज़ादी और लोकतंत्र को एक महान उपहार बताते हुए उन तत्वों पर कड़ी आलोचना की, जो देश के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने को कमजोर और बिखेरना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि ‘आज़ादी क्या होती है, यह हमसे पूछो, कुर्बानियां हमने दी हैं।’
भारत की स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास दारुल उलूम देवबंद, उलेमा, मदरसों और मुसलमानों की महान कुर्बानियों के उल्लेख के बिना न तो लिखा जा सकता है और न ही समझा जा सकता है। मौलाना मदनी ने कहा कि दारुल उलूम देवबंद की स्थापना ही ऐसे स्वतंत्रता सेनानियों को तैयार करने के उद्देश्य से की गई थी, जो देश को अंग्रेजी गुलामी से आज़ाद कराने के लिए संघर्ष करें। 1857 के बाद 1866 में दारुल उलूम देवबंद की स्थापना हुई। अफसोस की बात है कि आज इतिहास को तोड़-मरोड़कर पेश करते हुए उन्हीं मदरसों को आतंकवाद से जोड़ने की नापाक कोशिश की जा रही है, जिन शिक्षण संस्थानों से गुलामी के खिलाफ सबसे पहले आज़ादी का बिगुल बजा था।
देशभक्ति का प्रमाणपत्र बांटने वालों के वैचारिक पूर्वज जंग-ए-आजादी के समय कहां थे?
मौलाना मदनी ने कहा कि रेशमी रूमाल आंदोलन और माल्टा की कैद हमारी इतिहास की ऐसी रोशन गाथाएं हैं, जिन्हें कोई सांप्रदायिक ताकत मिटा नहीं सकती। शेखुल हिंद मौलाना महमूद हसन देवबंदी रहमतुल्लाह अलैह, शेखुल इस्लाम मौलाना हुसैन अहमद मदनी और उनके साथियों को सात समंदर पार माल्टा में इसलिए कैद किया गया था कि वे भारत को ब्रिटिश गुलामी से आज़ाद देखना चाहते थे।
उन्होंने सांप्रदायिक ताकतों से सवाल किया कि जब हमारे बुजुर्ग माल्टा में कैद थे, उलेमा अंग्रेजों के खिलाफ जेलें भर रहे थे और देश की आज़ादी के लिए अपनी जानें कुर्बान कर रहे थे, तो आज देशभक्ति का प्रमाणपत्र बांटने वालों के वैचारिक पूर्वज उस समय कहां थे? इसलिए मुसलमानों और मदरसों से देशभक्ति का प्रमाण मांगने से पहले उन्हें इतिहास के आईने में अपना अतीत देखना चाहिए।
मौलाना मदनी ने आगे कहा कि ऐसा नहीं है कि पहले जो लोग सत्ता में थे, वे इन हालात के लिए जिम्मेदार नहीं थे। उन्होंने भी मुसलमानों को सामाजिक, शैक्षिक और राजनीतिक रूप से नुकसान पहुंचाने की हमेशा कोशिशें कीं और मुस्लिम विरोधी दंगे भी होते रहे। लेकिन उस समय और आज के हालात में बड़ा फर्क यह है कि उस समय मुसलमान निशाने पर थे, लेकिन अब इस्लाम भी निशाने पर है। उन्होंने कहा कि इस्लाम को मिटाने वाले खुद मिट गए, लेकिन इस्लाम ज़िंदा रहा और इंशाअल्लाह कयामत तक ज़िंदा रहेगा।
सोवियत रूस का उदाहरण देते हुए मौलाना मदनी ने कहा कि वहां वर्षों तक कम्युनिज्म को बढ़ावा देकर इस्लाम को खत्म करने की कोशिशें की जाती रहीं। यहां तक कि मस्जिदों और धार्मिक मदरसों पर पाबंदियां लगा दी गईं और वर्षों तक मस्जिदों से अज़ान तक की आवाज़ नहीं आई। लेकिन दुनिया ने देखा कि सोवियत रूस के टुकड़े-टुकड़े हो गए और उसके बाद कई मुस्लिम देश अस्तित्व में आए। उन्होंने कहा कि तमाम जुल्म और बर्बरता के बावजूद इस्लाम ज़िंदा है और मुसलमान ज़िंदा है।



