शायर, फ़नकार और खुद्दारी की ज़िंदा मिसाल थे ‘ज़िया नेहटौरी’
छह दशकों तक हिंदी-उर्दू अदब की ख़िदमत करने वाले शख्स ने दुनिया को कहा अलविदा, मगर उनके अल्फ़ाज़ और फ़िक्र हमेशा ज़िंदा रहेंगे
नई नस्ल के शायरों और कवियों की हौसलाअफ़ज़ाई को बनाया अपना मिशन
मोहम्मद शाह नज़र
देहरादून। कुछ लोग दुनिया से रुख़सत होने के बाद भी अपने काम, अपने किरदार और अपने अल्फ़ाज़ के ज़रिये लोगों के दिलों में ज़िंदा रहते हैं। उनकी ज़िंदगी का असल हासिल दौलत, शोहरत या ऊंचे ओहदे नहीं, बल्कि वह मोहब्बत, इज़्ज़त और विरासत होती है, जो वे अपने पीछे छोड़ जाते हैं। उस्ताद शायर shayar सैयद ज़िया-उल-हसन जैदी ‘ज़िया नेहटौरी’ Syed Zia-ul-Hasan ‘Ziya Nehtauri’ ऐसी ही शख्सियत का नाम है। उनका इंतकाल देहरादून Dehradun की अदबी दुनिया के लिए एक ऐसी कमी छोड़ गया है, जिसे भर पाना आसान नहीं होगा।
हिंदी और उर्दू साहित्य की छह दशकों से अधिक समय तक खि़दमत करने वाले ज़िया नेहटौरी Syed Zia-ul-Hasan ‘Ziya Nehtauri’ का सोमवार सुबह दिल का दौरा पड़ने से इंतकाल हो गया। वह 86 वर्ष के थे। लंबे समय से प्रोस्टेट की समस्या से जूझ रहे ज़िया साहब ने अपनी पूरी ज़िंदगी शायरी, फाइन आर्ट, फोटोग्राफी और इंसानी रिश्तों की ख़ूबसूरती को समर्पित कर दी। करीब 15 दिन पहले दून अस्पताल में उनके प्रोस्टेट (गदूद) का ऑपरेशन हुआ था। रविवार को दिल का दौरा पड़ने के बाद उन्हें महंत इंद्रेश अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां सोमवार सुबह उन्होंने अंतिम सांस ली। सोमवार शाम मेहूंवाला में उन्हें सुपुर्द-ए-ख़ाक किया गया। उनके जाने से साहित्य, कला और सामाजिक सद्भाव से जुड़े लोगों में गहरा दुख है। ज़िया नेहटौरी को याद करना महज़ एक शायर को याद करना नहीं है। यह उस दौर की साहित्यिक तहज़ीब को याद करना है, जिसमें शायरी को ज़िंदगी से अलग करके नहीं देखा जाता था, जिसमें एक शायर की पहचान उसके कलाम के साथ-साथ उसके किरदार, खुद्दारी और दूसरों के लिए किए गए कामों से भी होती थी।
करनपुर से शुरू हुआ सफ़र, अदब की दुनिया में बनाई अलग पहचान
डॉ. अब्दुल रब गढ़वाली नदवी की पुस्तक ‘तज़किरा-ए-शुअरा-ए-किराम उत्तराखंड’ में दर्ज विवरण के मुताबिक, सैयद ज़िया-उल-हसन जैदी का जन्म 4 जनवरी 1940 को देहरादून के करनपुर में हुआ था। उनके पिता सैयद जाहिद हसन जैदी फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट (एफआरआई) में कार्यरत थे। उनका परिवार मूल रूप से उत्तर प्रदेश के नेहटौर से संबंधित था, लेकिन बाद में देहरादून में आकर बस गया। साहित्यिक दुनिया ने उन्हें ‘ज़िया नेहटौरी’ के नाम से जाना। ज़िया साहब ने 1956 में देहरादून से हाईस्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके बाद उन्होंने फाइन आर्ट की बारीकियां सीखीं। उनकी नौकरी ओएनजीसी में लगी, लेकिन माता-पिता की सेवा को प्राथमिकता देते हुए उन्होंने नौकरी छोड़ दी। इसके बाद फाइन आर्ट, फोटोग्राफी और शायरी Zia Sahib dedicated his entire life to poetry, fine art, photography, and the beauty of human relationships. उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गए।
शायरी की बारीकियां उन्होंने शंकर स्वरूप भटनागर ‘मफ़तू’ शिकोहाबादी से सीखीं। उस्ताद से हासिल की गई साहित्यिक समझ और अपने अनुभवों ने उनके कलाम को एक अलग पहचान दी। वह उन शायरों में थे, जिन्होंने अदब को केवल महफ़िलों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे अपने व्यवहार और जीवन के तौर-तरीकों में भी उतारा।
पीसीएस-जे के अभ्यर्थियों को सिखाई उर्दू, इल्म बांटने को मानते थे अपनी जिम्मेदारी
ज़िया नेहटौरी की साहित्यिक और सामाजिक सेवाओं का दायरा मुशायरों और अदबी महफ़िलों तक सीमित नहीं था। उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में भी अहम योगदान दिया। एक दौर ऐसा था, जब न्यायिक सेवा की परीक्षा में उर्दू भाषा का एक प्रश्नपत्र होता था। उस समय पीसीएस-जे (प्रांतीय सिविल सेवा-न्यायिक) की तैयारी करने वाले अनेक अभ्यर्थियों ने ज़िया साहब से उर्दू भाषा का ज्ञान हासिल किया। उन्होंने अभ्यर्थियों को उर्दू भाषा की बारीकियों से परिचित कराया और उनकी परीक्षा की तैयारी में मदद की। उनके लिए इल्म बांटना महज़ एक शैक्षणिक काम नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ी को ज्ञान और अवसरों से जोड़ने का माध्यम था। यह उनकी उस सोच को भी सामने लाता है, जिसमें भाषा और साहित्य को समाज की तरक्की का जरूरी हिस्सा माना जाता है।
ज़िया साहब की यह खि़दमत बताती है कि वह अपने ज्ञान को अपने तक सीमित रखने के बजाय दूसरों तक पहुंचाने में विश्वास रखते थे। उनके लिए उर्दू केवल शायरी की भाषा नहीं, बल्कि ज्ञान, तहज़ीब और सांस्कृतिक विरासत की अमानत भी थी। दूरदर्शन उत्तराखंड के ‘साहित्य-यात्रा’ कार्यक्रम में 25 फरवरी 2021 को उर्दू अदब की दशा और दिशा पर उनसे बातचीत की गई थी। यह कार्यक्रम उनके साहित्यिक विचारों को समझने का एक महत्वपूर्ण संदर्भ है।
वक्त की पाबंदी का दिया सबक, नमाज़ को बनाया मिसाल
ज़िया नेहटौरी की शख्सियत का एक महत्वपूर्ण पहलू उनकी वक्त की पाबंदी थी। वह समय की कीमत समझते थे और दूसरों से भी इसकी कद्र करने की अपेक्षा रखते थे। उनके साथ जुड़ा एक प्रसंग उनके अनुशासन और जीवन-दृष्टि को बखूबी सामने लाता है। एक बार वन गुर्जरों के बीच चलाए जा रहे शिक्षा जागरूकता अभियान में शामिल होने के लिए ज़िया साहब को आमंत्रित किया गया। कार्यक्रम एक मदरसे में आयोजित होना था। वह तय समय से पहले ही अपनी साईकिल से मदरसे पहुंच गए, जबकि उनके साथ जाने वाले कई साथी देर से पहुंचे। साथियों के देर से आने पर उन्होंने उन्हें समय की अहमियत समझाते हुए कहा, वक्त की कदर करना सीखो और नमाज़ों के समय से अपने आप को समय का पाबंद बनाओ। उनकी इस बात में केवल धार्मिक शिक्षा नहीं, बल्कि अनुशासित जीवन जीने का व्यावहारिक संदेश भी था। वह मानते थे कि समय का सम्मान करना इंसान के व्यक्तित्व और उसके काम, दोनों को बेहतर बनाता है।
चालीस वर्षों तक बिना किसी दिखावे के करते रहे खि़दमत
ज़िया नेहटौरी की ज़िंदगी का सबसे प्रेरणादायक पहलू उनकी सेवा भावना थी। धामावाला स्थित कमल मार्केट में अपने फोटो स्टूडियो के ज़रिये उन्होंने करीब चार दशक तक उर्दू भाषा और साहित्य के उत्थान के लिए निःशुल्क सेवाएं दीं। उन्होंने ‘सुख़न साहित्य संस्था’ की स्थापना कर साहित्यिक गतिविधियों को आगे बढ़ाने में भी योगदान दिया। उनकी दुनिया में शायरी केवल अपना नाम चमकाने का माध्यम नहीं थी। वह चाहते थे कि अदब का दायरा बढ़े, नई प्रतिभाओं को अवसर मिले और हिंदी-उर्दू साहित्य की साझा विरासत अगली पीढ़ी तक पहुंचे। उन्होंने अनेक शायरों और कवियों को प्रोत्साहित किया। कई लोगों के लिए वह एक मार्गदर्शक, मददगार और ऐसे बुज़ुर्ग साहित्यकार रहे, जिनसे हौसला मिलता था। पेशे से प्रेस फोटोग्राफर और फाइन आर्ट के जाने-माने चित्रकार होने के बावजूद उन्होंने अपनी ज़िंदगी में सादगी को सबसे ऊपर रखा। किराए के मकान में रहते हुए भी उन्होंने अपनी खुद्दारी से समझौता नहीं किया। उनके व्यक्तित्व में दिखावे से दूरी और आत्मसम्मान के प्रति अटूट निष्ठा थी।
नित्यानंद स्वामी से पुराने पारिवारिक संबंध, एक प्रसंग में दिखी आत्मीयता
ज़िया नेहटौरी के संबंध उत्तराखंड के प्रथम मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी से भी पुराने और आत्मीय थे। दोनों परिवारों के बीच परिचय उनके पिता के समय से था। ज़िया साहब के पिता और नित्यानंद स्वामी के पिता फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट (एफआरआई) में सेवारत थे। पड़ोसी होने के कारण दोनों परिवारों में निकटता थी, जो आगे चलकर भी आत्मीय संबंधों का आधार बनी रही। नित्यानंद स्वामी के मुख्यमंत्री बनने के बाद का एक प्रसंग ज़िया साहब की बेबाकी और स्वामी जी के सहज व्यवहार को सामने लाता है। ज़िया साहब के एक करीबी शिक्षक का तबादला दूर किसी स्थान पर कर दिया गया था। शिक्षक की समस्या को लेकर बात करने के लिए वह नित्यानंद स्वामी से मिलने उनके घर पहुंचे। बताया जाता है कि स्वामी जी ने उन्हें देखते ही आत्मीय अंदाज में कहा, “भई, फिलहाल तो घर में खिचड़ी बनी है, यह खाइए। चार दिन बाद फलां स्थान पर एक कार्यक्रम है, वहां आइए और अपनी बात रखिए।”
ज़िया साहब ने उनकी बात स्वीकार की और चार दिन बाद निर्धारित कार्यक्रम में पहुंचे। वहां उन्होंने शिक्षक के तबादले से जुड़ी समस्या उनके सामने रखी। स्वामी जी ने अधिकारियों से मामले की जानकारी ली। संस्मरण के मुताबिक, अधिकारियों ने बताया कि उस समय करीब 400 शिक्षकों के तबादले किए गए थे। इसके बाद स्वामी जी ने सभी तबादलों को निरस्त करने का आदेश दे दिया। यह प्रसंग ज़िया नेहटौरी और नित्यानंद स्वामी के पुराने संबंधों के साथ-साथ उस दौर के एक प्रशासनिक घटनाक्रम की याद भी दिलाता है। इसमें एक ओर ज़िया साहब की अपने परिचित की समस्या को लेकर पहल दिखाई देती है, तो दूसरी ओर पुराने संबंधों में मौजूद आत्मीयता भी सामने आती है।
खुद्दारी की मिसाल थे ज़िया साहब
उत्तराखंड भाषा संस्थान के सदस्य और उत्तराखंड उर्दू अकादमी के पूर्व उपाध्यक्ष, अंतरराष्ट्रीय शायर अफ़ज़ल मंगलोरी Afzal manglori ज़िया नेहटौरी ‘Ziya Nehtauri’ के इंतकाल पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए कहते है कि ज़िया साहब ने पूरी ज़िंदगी किराए के मकान में गुज़ार दी, लेकिन कभी किसी के सामने हाथ नहीं फैलाया। उन्होंने हमेशा खुद्दारी और स्वाभिमान के साथ जीवन व्यतीत किया। अफ़ज़ल मंगलोरी के मुताबिक ज़िया नेहटौरी ने उनके जैसे अनेक शायरों और कवियों को आगे बढ़ाने तथा प्रोत्साहित करने का काम किया। उनकी साहित्यिक और सामाजिक सेवाओं को देखते हुए वह मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से मुलाकात कर उनके परिवार को मरणोपरांत सम्मान दिलाने का अनुरोध करेंगे।
ज़िया नेहटौरी का कलामः सवाल, संघर्ष और बदलाव की आवाज़
ज़िया नेहटौरी ‘Ziya Nehtauri’ की शायरी में सामाजिक चेतना, अन्याय के प्रति बेचैनी, इंसानी संघर्ष और बदलाव की उम्मीद के स्वर सुनाई देते हैं। उनका कलाम पाठक को केवल भावनाओं में नहीं बहाता, बल्कि सोचने पर भी मजबूर करता है। उनकी ग़ज़ल के अशआर में सवाल उठाने का साहस है, अंधेरों के विरुद्ध रोशनी की तलाश है और अपनी कमियों को पहचानने की नसीहत भी है।
ज़िया नेहटौरी की ग़ज़ल
सवाल-ए-हक़ का जब भी उल्टा जवाब निकलेगा,
नतीजा इसका यक़ीनन ख़राब निकलेगा।
जो छांट देगा अंधेरों को सारी दुनिया से,
ज़रूर ऐसा कोई आफ़ताब निकलेगा।
उजाड़ देगी तुम्हें देखना ये ख़ुशफ़हमी,
बबूल बोए तो कैसे गुलाब निकलेगा।
ये ज़ुल्म-ओ-जबर का अंदाज़ा कह रहा है यही,
ऐसी फ़ज़ा से कोई इंक़लाब निकलेगा।
मैं अपने क़त्ल का इल्ज़ाम किसको दूं आखि़र,
क़ुसूर मेरा ही फिर भी जनाब निकलेगा।
तुम्हारी जद्दो-जहद में ही कुछ कमी है ज़िया,
फ़ुज़ूल बातों से कोई ख़्वाब निकलेगा।
शेरों में छिपे विचार और संदेश
हक़ के सवाल और गलत जवाब का अंजाम ‘सवाल-ए-हक़ का जब भी उल्टा जवाब निकलेगा, नतीजा इसका यक़ीनन ख़राब निकलेगा।’ इस शेर में शायर कहते हैं कि जब हक़ और इंसाफ़ से जुड़े सवालों का जवाब सचाई के बजाय टालमटोल, ग़लतबयानी या अन्याय से दिया जाएगा, तो उसका नतीजा अच्छा नहीं हो सकता। सही सवालों को दबाने से समस्या समाप्त नहीं होती, बल्कि वह और गंभीर होती जाती है। यह शेर सत्ता, समाज और व्यक्ति, सभी के लिए एक संदेश रखता है। सच का सामना करने के बजाय उसे नकारना आखिरकार नुकसान का कारण बनता है। ज़िया साहब की यह बात आज भी प्रासंगिक है कि सवालों का जवाब ईमानदारी से देना ही बेहतर भविष्य की बुनियाद है।
अंधेरों के बीच आफ़ताब की उम्मीद ‘जो छांट देगा अंधेरों को सारी दुनिया से, ज़रूर ऐसा कोई आफ़ताब निकलेगा।’ यहां ‘अंधेरा’ अन्याय, अज्ञान, निराशा और सामाजिक बुराइयों का प्रतीक है, जबकि ‘आफ़ताब’ रोशनी, ज्ञान, इंसाफ़ और उम्मीद का रूपक है। शायर का विश्वास है कि अंधेरा चाहे कितना ही गहरा क्यों न हो, उसे दूर करने वाली रोशनी की संभावना हमेशा बनी रहती है। यह रोशनी किसी जागरूक इंसान, नई सोच या ऐसे प्रयास के रूप में सामने आ सकती है, जो समाज की दिशा बदलने का साहस रखता हो।
बबूल बोकर गुलाब की उम्मीद नहीं की जा सकती ‘उजाड़ देगी तुम्हें देखना ये ख़ुशफ़हमी, बबूल बोए तो कैसे गुलाब निकलेगा।’
इस शेर में शायर ने इंसानी व्यवहार और उसके परिणामों के बीच संबंध को प्रभावशाली ढंग से सामने रखा है। बबूल के बीज बोकर गुलाब की उम्मीद करना ऐसी खुशफ़हमी है, जिसमें इंसान अपने कर्मों की वास्तविकता को स्वीकार नहीं करना चाहता। यदि समाज में नफ़रत, अन्याय, बेईमानी और कटुता बोई जाएगी, तो वहां प्रेम, सद्भाव और इंसाफ़ की फसल कैसे तैयार होगी? अच्छे परिणामों के लिए अच्छे प्रयास और सही आचरण आवश्यक हैं। इस शेर का व्यापक संदेश है कि इंसान को अपनी उम्मीदों के साथ अपने कर्मों का भी मूल्यांकन करना चाहिए। बेहतर समाज की बुनियाद अच्छे विचारों और सकारात्मक कार्यों से ही तैयार होती है।
ज़ुल्म की फ़ज़ा से इंक़लाब का जन्म ‘ये ज़ुल्म-ओ-जबर का अंदाज़ा कह रहा है यही, ऐसी फ़ज़ा से कोई इंक़लाब निकलेगा।’ यह शेर बताता है कि जब अन्याय, अत्याचार और दमन अपनी हदें पार करने लगते हैं, तो समाज में बदलाव की आकांक्षा भी तेज़ हो जाती है। शायर ऐसी परिस्थितियों को संभावित परिवर्तन की भूमिका के रूप में देखते हैं। यहां ‘इंक़लाब’ का अर्थ केवल राजनीतिक क्रांति तक सीमित नहीं है। यह सामाजिक चेतना, विचारों में परिवर्तन, इंसाफ़ की मांग और पुरानी बुराइयों को बदलने की कोशिश भी हो सकता है। शेर में एक चेतावनी भी हैः अन्याय को लगातार बढ़ने देना अंततः समाज और व्यवस्था के लिए गंभीर परिणाम पैदा कर सकता है। स्थायी शांति और विश्वास के लिए इंसाफ़ और सम्मान जरूरी हैं।
आत्ममंथन और अपनी जिम्मेदारी का एहसास ‘मैं अपने क़त्ल का इल्ज़ाम किसको दूं आखि़र, क़ुसूर मेरा ही फिर भी जनाब निकलेगा।’ इस शेर में शायर आत्ममंथन की ओर बढ़ते दिखाई देते हैं। वह अपने ऊपर हुए नुकसान या अपने पतन के लिए दूसरों को दोष देने के बजाय अपनी भूमिका पर भी सवाल उठाते हैं। यहां ‘क़त्ल’ को रूपक के रूप में भी पढ़ा जा सकता है, किसी उम्मीद का टूट जाना, व्यक्तित्व का कुचल जाना या अपने ही निर्णयों से नुकसान उठाना।
खोखली बातों से नहीं, मेहनत से पूरे होते हैं ख़्वाब ‘तुम्हारी जद्दो-जहद में ही कुछ कमी है ज़िया, फ़ुज़ूल बातों से कोई ख़्वाब निकलेगा।’ ग़ज़ल का आखिरी शेर शायर की अपनी ही शख्सियत को संबोधित करता है। यह आत्मसंवाद है, जिसमें वह खुद को याद दिलाते हैं कि सपनों को हकीकत में बदलने के लिए संघर्ष, मेहनत और निरंतर प्रयास आवश्यक हैं। सिर्फ बातें करने, योजनाएं बनाने या उम्मीद पालने से मंजिल नहीं मिलती। यदि प्रयासों में कमी है, तो नतीजे भी अधूरे रहेंगे। ख़्वाब तभी साकार होते हैं, जब इंसान उन्हें पूरा करने के लिए अपनी ऊर्जा और समय लगाता है।
उनकी शायरी और उनकी ज़िंदगी में दिखाई देता है एक साझा संदेश
ज़िया नेहटौरी की इस ग़ज़ल में उठाए गए सवाल उनके जीवन के मूल्यों से भी मेल खाते हैं। उन्होंने अपने पेशेवर जीवन में कला और फोटोग्राफी को अपनाया, साहित्य के लिए समय निकाला और उर्दू की सेवा को निजी लाभ से ऊपर रखा। उनके बारे में उपलब्ध संस्मरण बताते हैं कि उन्होंने नई प्रतिभाओं को प्रोत्साहित किया और अपनी सीमित परिस्थितियों के बावजूद स्वाभिमान के साथ जीवन जिया।
ज़िया नेहटौरी ‘Ziya Nehtauri’अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी ग़ज़ल के सवाल, आफ़ताब की उम्मीद, बबूल और गुलाब का रूपक तथा मेहनत से ख़्वाब पूरे करने का संदेश लंबे समय तक पढ़ने वालों को सोचने पर मजबूर करता रहेगा। उनकी जिंदगी से जुड़े संस्मरण भी याद दिलाते रहेंगे कि इल्म बांटना, समय की कद्र करना और दूसरों की मदद करना किसी भी इंसान की शख्सियत को बड़ा बनाता है। किसी शायर की असल विरासत यही है कि उसके जाने के बाद भी उसके अल्फ़ाज़ लोगों के भीतर सवाल जगाते रहें, उम्मीद पैदा करें और बेहतर इंसान बनने की प्रेरणा दें। उस्ताद ज़िया नेहटौरी की याद को यही सबसे सच्चा ख़िराज-ए-अक़ीदत होगा।