‘भय्या के आर्शीवाद’ से ‘स्वतंत्र’ हुआ भारद्वाज
पटियाला कोर्ट ने दी अंतरिम जमानत
न्याय के पैमाने पर फिर उठे सवाल
नई दिल्ली। जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान हुई कथित मारपीट के मामले में गिरफ्तार किये गये स्वतंत्र भारद्वाज(Swatantra Bhardwaj) को ‘भय्या के आर्शीवाद’ से फिलहाल ‘आजादी’ मिल गई है। गिरफ्तारी के समय हमने यही सवाल उठाया था, कि आखिर दिल्ली पुलिस Delhi Police कब तक ‘स्वतंत्र’ को ‘कैद’ रख पाएगी, हमारी शंका सही साबित हुई और ‘भय्या जी के आर्शीवाद’ से भारद्वाज फिलहाल ‘स्वतंत्र’ हो गया है।
अदालत से अंतरिम जमानत मिलने के बाद राजनीतिक और सामाजिक हलकों में इस फैसले को लेकर चर्चा तेज हो गई है। अदालत की ओर से मिली यह राहत मामले में अंतिम निर्णय नहीं है, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया के दौरान दी गई अंतरिम राहत है।
मामला उस समय सुर्खियों में आया था, जब जंतर-मंतर पर आयोजित एक प्रदर्शन के दौरान एक प्रदर्शनकारी के पिता के साथ कथित मारपीट का आरोप स्वतंत्र भारद्वाज पर लगाया गया। शिकायत के आधार पर पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू की। मामले में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम सहित अन्य कानूनी प्रावधानों के तहत कार्रवाई किए जाने की जानकारी सामने आई।
पुलिस कार्रवाई के बाद भारद्वाज को गिरफ्तार किया गया और अदालत के समक्ष पेश किया गया। बचाव पक्ष ने आरोपों से इनकार करते हुए गिरफ्तारी को राजनीतिक दबाव से प्रेरित बताया। बचाव पक्ष की ओर से यह भी दलील दी गई कि घटना के दौरान शिकायतकर्ता पक्ष की ओर से पहले हमला किए जाने की बात सामने आई थी। दूसरी ओर, शिकायतकर्ता पक्ष और पुलिस ने मामले की गंभीरता तथा जांच से जुड़े तथ्यों को अदालत के समक्ष रखा।
अदालत ने मामले की परिस्थितियों और उपलब्ध कानूनी सामग्री पर विचार करने के बाद भारद्वाज को अंतरिम जमानत प्रदान की। हालांकि, जमानत का अर्थ यह नहीं है कि अदालत ने आरोपी को आरोपों से मुक्त कर दिया है। मामले की जांच और आगे की न्यायिक कार्यवाही अपने निर्धारित तरीके से जारी रहेगी।
जमानत के फैसले ने छेड़ी नई बहस
स्वतंत्र भारद्वाज को मिली राहत के बाद सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में जमानत व्यवस्था को लेकर बहस शुरू हो गई है। कुछ लोग सवाल उठा रहे हैं कि अलग-अलग मामलों में आरोपियों को मिलने वाली न्यायिक राहत के मानदंड क्या समान हैं।
इसी संदर्भ में पूर्व आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट और दिल्ली दंगा मामले में आरोपी उमर खालिद का नाम भी चर्चा में आया है। हालांकि कानूनी दृष्टि से इन तीनों मामलों को एक समान मानना उचित नहीं होगा। प्रत्येक मामले में आरोपों की प्रकृति, लागू कानून, मुकदमे की स्थिति और संबंधित अदालतों के आदेश अलग-अलग हैं।
संजीव भट्ट एक पुराने हिरासत में मौत के मामले में दोषसिद्ध होकर सजा भुगत रहे हैं। उनकी स्थिति ऐसे आरोपी से अलग है, जिसके खिलाफ मुकदमा अभी विचाराधीन हो। इसी तरह उमर खालिद के खिलाफ दिल्ली दंगों से जुड़ी कथित बड़ी साजिश के मामले में कठोर कानूनों के तहत मुकदमा चल रहा है। उन्हें कुछ परिस्थितियों में अंतरिम राहत मिली है, लेकिन नियमित जमानत का प्रश्न अलग कानूनी प्रक्रिया का विषय है।
व्यवस्था पर उठ रहे सवाल
स्वतंत्र भारद्वाज को जमानत मिलने के बाद यह सवाल उठाया जा रहा है कि क्या देश में जमानत से जुड़े मामलों में सभी आरोपियों के लिए समान कानूनी कसौटी प्रभावी रूप से लागू हो रही है।
सोशल मीडिया पर इस फैसले को लेकर कई तरह की राजनीतिक टिप्पणियां की जा रही हैं। कुछ लोग इसे न्यायिक प्रक्रिया की सामान्य कार्रवाई मान रहे हैं, जबकि दूसरे पक्ष का कहना है कि गंभीर आरोपों वाले मामलों में अदालतों को जमानत देते समय समान मानदंड अपनाने चाहिए।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में अदालत का फैसला अंतिम कसौटी होता है। इसलिए जमानत के किसी आदेश को लेकर राजनीतिक बहस अपनी जगह हो सकती है, लेकिन आरोपों की सत्यता का अंतिम निर्धारण न्यायालय द्वारा साक्ष्यों और कानून के आधार पर ही किया जाएगा।
जमानत दोषमुक्ति नहीं
कानून की सामान्य प्रक्रिया में जमानत का अर्थ आरोपी को दोषमुक्त करना नहीं होता। इसका उद्देश्य मुकदमे के दौरान आरोपी को निर्धारित शर्तों के अधीन स्वतंत्रता देना होता है। अंतिम दोषसिद्धि या बरी किए जाने का फैसला मुकदमे की सुनवाई और साक्ष्यों के मूल्यांकन के बाद होता है।
इस लिहाज से स्वतंत्र भारद्वाज को मिली अंतरिम जमानत को मामले का अंतिम परिणाम मानना जल्दबाजी होगी। अब आगे की जांच और अदालत में होने वाली सुनवाई महत्वपूर्ण होगी।
फिलहाल इस मामले ने एक बार फिर देश में जमानत, न्यायिक समानता और राजनीतिक प्रभाव को लेकर चल रही बहस को सामने ला दिया है। सवाल कई हैं, लेकिन उनके अंतिम उत्तर अदालत की आगामी कार्यवाही और मामले के न्यायिक परिणाम से ही सामने आएंगे।



