- आजादी का पैगाम, इंसानियत के नाम’ मुशायरे में गूंजा मोहब्बत और राष्ट्रीय एकता का संदेश
- समाजसेवियों व रक्तदाताओं का किया गया सम्मान
देहरादून। संस्कृति विभाग के प्रेक्षागृह में ‘इंसाफ की दस्तक’ और एनएपीएसआर की ओर से ‘आजादी का पैगाम, इंसानियत के नाम’ मुशायरा एवं कवि सम्मेलन आयोजित किया गया। कार्यक्रम में देशभक्ति, इंसानियत, मोहब्बत, भाईचारे और सामाजिक सद्भाव से जुड़े कलाम ने देर रात तक श्रोताओं को बांधे रखा।
कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रयाग आईएएस अकादमी के निदेशक एवं पूर्व राज्य मंत्री आर.ए. खान ने की, जबकि पूर्व राज्य मंत्री याकूब सिद्दीकी मेहमान-ए-खुसूसी रहे। पद्मश्री डॉ. भूपेंद्र कुमार संजय, आर.ए. खान, याकूब सिद्दीकी, ताहिर अली और इकबाल अहमद ने शमा रोशन कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया। अंसार सिद्दीकी कैराना ने शानदार निजामत की।
अंतरराष्ट्रीय शायर अफजल मंगलौरी ने शहीदों को नमन करते हुए वतन और इंसानियत का संदेश दिया। जावेद आसी देवबंदी, दर्द गढ़वाली, परमवीर कौशिक, अमजद खान ‘अमजद’, चेतन सिंह खड़का, शादाब मशहदी, शिव चरण शर्मा ‘मुज्तर’, भरती आनंद, मोनिका मंतशा, इम्तियाज अकबराबादी, अंबिका सिंह रूही, बदरुद्दीन जिया, धनंजय उपाध्याय, शाख दूनवी और इकबाल आजर समेत अन्य शायरों व कवियों ने अपने कलाम पेश किए।
शिव चरण शर्मा ‘मुज्तर’ के शेर ’सांस लेने पड़ेंगे पूछकर सरकार से, धड़कने भी लिंक होने वाली हैं आधार से’ पर सभागार तालियों से गूंज उठा। वहीं परमवीर कौशिक ने मंदिर-मस्जिद की आस्था के सम्मान और आपसी भाईचारे का संदेश दिया।
समाजसेवियों और रक्तदाताओं का सम्मान
कार्यक्रम में समाजसेवा और रक्तदान के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाली हस्तियों को सम्मानित किया गया। इनमें टी-शेरिंग लुडिंग, मौलाना अब्दुल मन्नान कासमी, डॉ. अनिल वर्मा, डॉ. एम.एस. अंसारी, कल्पना बिष्ट, जाहिद हुसैन, योगेश अग्रवाल, मोहन सिंह खत्री, ब्लड फ्रेंड्स और इशरत जहां सहित अन्य शामिल रहे। डॉ. अनिल वर्मा के 155 बार रक्तदान करने पर विशेष रूप से सम्मान किया गया।
आयोजक मोहम्मद शाहनजर ने कहा कि इंसानियत केवल शब्दों तक सीमित नहीं, बल्कि जरूरतमंद के काम आने में है। वक्ताओं ने कहा कि भारत की ताकत उसकी विविधता, साझी संस्कृति और भाईचारे में है। साहित्य और शायरी समाज को जोड़ने का प्रभावी माध्यम हैं। कार्यक्रम को सफल बनाने में कोहिनूर आर्ट ज्वेलर्स के हाजी शेख इकबाल हुसैन, आर.ए. खान और याकूब सिद्दीकी का विशेष सहयोग रहा।
शहीदों को सलाम और वतन से मोहब्बत
अंतरराष्ट्रीय शायर अफजल मंगलौरी ने देशभक्ति और इंसानियत को एक सूत्र में पिरोते हुए पढ़ा,
“आजादी-वतन का हंसी ये पैगाम है,
इंसानियत के नाम मोहब्बत की शाम है।
कुर्बानियों से जिनकी मिली हमको राहतें,
भारत के उन शहीदों को मेरा सलाम है।”
जावेद आसी देवबंदी ने दर्द और प्रतिरोध के भाव को सामने रखते हुए कहा,
“यह मंजर देख कर मेरा सितमगर टूट जाता है,
मेरी गर्दन पर आकर खंजर टूट जाता है।”
दर्द गढ़वाली ने समाज में बढ़ती अदावत और घटती मोहब्बत पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए पढ़ा,
‘अदावतों के बीजों को दिल से उगाकर,
मुहब्बत का पौधा मुरझाने लगे हैं।
परमवीर कौशिक ने धर्म के नाम पर फैल रही नफरत पर करारा संदेश देते हुए कहा,
“मंदिर-मस्जिद की अजमत का दोनों रखें पास,
तुम भी अपना रोजा रखो, मैं रखूं उपवास।”
अमजद खान ‘अमजद’ ने गरीबी की पीड़ा को शब्द देते हुए कहा,
“चलना मुश्किल कर देती है मुफलिस का,
खाली जेब भी कितनी भारी होती है।”
चेतन सिंह खड़का ने मौजूदा सामाजिक हालात पर सवाल उठाते हुए पढ़ा,
“इंसानियत यहाँ पे जिंदा कब है,
जमीं यहाँ की खूं से लबालब है।”
शादाब मशहदी ने देशप्रेम से ओतप्रोत कलाम पेश करते हुए कहा,
“नहीं है खौफ कोई, जान रखते हैं हथेली पर,
कि हम दिल से, जिगर से, जां से हिन्दुस्तान वाले हैं।”
शिव चरण शर्मा ‘मुज्तर’ ने मौजूदा हालात पर व्यंग्य करते हुए कहा,
“सांस लेने पड़ेंगे पूछकर सरकार से,
धड़कने भी लिंक होने वाली हैं आधार से।”
भरती आनंद ने आजादी के लिए कुर्बानी देने वाले अमर शहीदों को याद करते हुए कहा,
“आजादी को चले चूमने वो कैसे मस्ताने थे,
राजगुरु, अशफाक, भगत सिंह के जैसे दीवाने थे।”
मोनिका मंतशा ने मोहब्बत और रिश्तों की रोशनी को कायम रखने का संदेश देते हुए पढ़ा,
“रिफाकतों के उजाले सदा रखे कायम,
जहाँ चराग बुझे हमने दिल जलाए हैं।”
इम्तियाज अकबराबादी ने वतन से मोहब्बत का इजहार करते हुए कहा,
“खुशबुओं से भरा चमन मेरा,
मुझको प्यारा है ये वतन मेरा।”
अंबिका सिंह रूही ने मोहब्बत को इंसान की जिंदगी में सुकून और छांव देने वाला शजर बताते हुए पढ़ा,
“सहरा की तपती रेत सा आतिशजदा हर पल,
तुम हो मुहब्बत का शजर, तुम साथ आ जाओ।”
बदरुद्दीन जिया ने जिंदगी की व्यापकता और मृत्यु के बाद के सफर की ओर संकेत करते हुए कहा,
“जिंदगी मौत तक नहीं महदूद,
इससे आगे का मरहला भी है।”
धनंजय उपाध्याय ने मोहब्बत और गलतफहमी के रिश्ते को बयान करते हुए कहा,
“जब तक मुझे भरम था, उसके बहम में था,
उसको भी मेरी फिक्र, ऐसे फहम में था।”
शाख दूनवी ने प्रेम की एक खूबसूरत लेकिन उलझी हुई स्थिति को इन अल्फाज में बयां किया,
“मैंने जब देखा उसे तो उसने आंखें फेर लीं,
उसने जब देखा मुझे, मैं देखता ही रह गया।”
इकबाल आजर ने पड़ोसी मुल्क और अपने देश की किस्मत को जोड़ते हुए कहा,
“पड़ोसी सा न मिल पाया पड़ोसी,
मेरी किस्मत भी हिन्दुस्तान सी है।”
इसके अलावा अंबर खरबंदा, असलम खतोलवी, रही नेहटोरी और डॉ. भूपेंद्र कुमार सिंह ‘संजय’ ने भी अपने कलाम पेश कर श्रोताओं की खूब वाहवाही बटोरी।
