प्रतिरोध, संवाद और समयबोध पर गहन विमर्श

प्रतिरोध, संवाद और समयबोध पर गहन विमर्श

प्रयागराज। मंगलवार को चौधरी महादेव प्रसाद महाविद्यालय (सीएमपी डिग्री कॉलेज), प्रयागराज के सभागार में कथाकार रणविजय सिंह सत्यकेतु द्वारा संपादित काव्य-संकलन ‘चेतना के दस द्वीप’ पर संगत और आखर (साहित्यिक–सांस्कृतिक मंच) के संयुक्त तत्वावधान में परिचर्चा एवं कविता पाठ का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में समकालीन कविता के प्रतिरोध, संवाद और समयबोध पर गहन विमर्श हुआ।

आधार वक्तव्य देते हुए डॉ. सुधांशु मालवीय ने कहा कि यह संकलन आज के कवियों के प्रतिरोध के स्वर को सहेजता है। उन्होंने महमूद दरवेश, फैज, ब्रेख्त, नजरुल, निराला और पाश को स्मरण करते हुए कहा कि किसी भी साहित्य की सबसे बड़ी शर्त समय से संवाद है। आज संवाद, मंच और संस्थाओं की नितांत आवश्यकता है, क्योंकि पाठक वर्ग की उपेक्षा कविता की धार को कुंद करती है।

हिंदी विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय के आचार्य प्रो. आशुतोष पार्थेश्वर ने संकलन का स्वागत करते हुए कहा कि संपादक की भूमिका अत्यंत पठनीय है। उन्होंने संकलन में शामिल कविताओं में इलाहाबाद, गंगा-जमुनी तहज़ीब और काव्य-चेतना की उपस्थिति को रेखांकित किया तथा बोधिसत्व, अंशु मालवीय, रविकान्त, विवेक निराला सहित अन्य कवियों की कविताओं पर विचार व्यक्त किए।

प्रो. प्रणय कृष्ण ने कहा कि अंशु मालवीय की कविताएं इतिहास और संस्कृति का पुनर्पाठ करती हैं तथा मिथकों का अपकेंद्रण करती हैं। उन्होंने बोधिसत्व की पागलदास कविता को न्याय और सत्य के पक्ष में खड़ी कविता बताया। प्रो. सरोज सिंह ने कहा कि संकलन की भूमिका सशक्त है और इसमें शामिल कवियों की कविताएं प्रेम, प्रकृति, इंसानियत और सामाजिक बेचैनी को स्वर देती हैं। उन्होंने वाज़दा ख़ान, वसुंधरा पाण्डेय, विवेक निराला और संतोष चतुर्वेदी की कविताओं के अंशों का उल्लेख किया।

प्रो. कुमार वीरेन्द्र ने कहा कि इस संकलन में प्रेम और प्रतिरोध को आगे बढ़ाने वाले कवि सम्मिलित हैं। उन्होंने निराला, मंटो और कुंवर नारायण को स्मरण करते हुए समकालीन संदर्भों में कविताओं की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला।

अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में वरिष्ठ कवि हरीशचंद्र पांडे ने कहा कि लंबे अंतराल के बाद ऐसा महत्वपूर्ण काव्य-उपक्रम सामने आया है, जिसमें प्रेम, प्रकृति, श्रमशील जीवन और प्रतिरोध के स्वर एक साथ उपस्थित हैं। उन्होंने कहा कि संकलन में शामिल कवि अपने काव्य-प्रयोगों और नए छंदों के माध्यम से समकालीन कविता को समृद्ध करते हैं। कार्यक्रम का संचालन डॉ प्रेमशंकर सिंह ने किया।

कार्यक्रम में श्रीप्रकाश मिश्र, डॉ. अनंत सिंह, हितेश कुमार सिंह, डॉ अंकित पाठक, प्रो. आभा त्रिपाठी, प्रो. दीनानाथ, डॉ. कल्पना वर्मा, डॉ. झरना मालवीय, डॉ़ अंशुमान कुशवाहा, प्रेयस, जुमर मुश्ताक, प्रिंस, विवेक सत्यांशु, केतन यादव, माधुरी सिंह, प्रदीप पार्थिव, आर्यन मिश्रा, शशि भूषण सहित बड़ी संख्या में साहित्यप्रेमी, शोधार्थी और छात्र उपस्थित रहे। परिचर्चा और कविता पाठ ने समकालीन कविता में संवाद और प्रतिरोध के महत्व को रेखांकित किया।

कार्यक्रम के आरंभ में संकलन में शामिल कवियों और प्रतिभागियों द्वारा कविता पाठ किया गया। कवि अंशु मालवीय ने अवस्थी ट्रंक स्टोर और कसूर की घटना का पाठ किया। बसंत त्रिपाठी ने युद्ध के बाद जीवन और रात बहुत है बाकी अभी का पाठ किया। रविकांत ने जीवन भीम पलाशी, चमाईन और औरंगज़ेब कविता का पाठ किया।

कवयित्री संध्या नवोदिता ने चाँद पर मालिकाना, आप तो नहीं हैं चूहा और देश-देश कविता का पाठ किया। संतोष चतुर्वेदी ने पिता जी जब छोटे हो जाएंगे, अंशुल त्रिपाठी ने अलगाव, साधो कन्हाई और सांस्कृतिक केंद्र की एक शाम का पाठ किया। शोध छात्रा मनीता यादव ने वाज़दा ख़ान की कविता नफरतों का दौर, छात्र अंकित ने बोधिसत्व की माँ का नाच तथा अंजनी शुक्ला ने वसुंधरा पाण्डेय की कविता का पाठ किया।